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Shubhapallaba
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    समझौता


    आज मैंने वक़्त के साथ
    फिर एक समझौता किया
    अपनेपन से भरे एक दुनियां को
    सौदे में दे के
    एक दिन का सौदा किया
    अर्सों से सांची हुई सपनो के गुल्लक को
    अनजान बन के थोडासा खरौच दिया
    कुछ पड़े हुए छुट्टे उम्र की चोरी की
    और कबसे अंधीयारों में कहीं बंद पड़ी

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